Tuesday, July 15, 2008




उत्तराखण्ड के दो महान चिंतक स्व० इन्द्रमणि बडोनी एवं श्री काशी सिंह ऎरी






पर्वतीय गांधी स्व० इन्द्रमणि बडोनी




प्रमुख आन्दोलनकारी एक साथ





बडोनी जी आन्दोलनकारियों के साथ

अमर शहीद- बाबा मोहन उत्तराखण्डी

१९४९ में श्री मनबर सिंह रावत के घर में जन्मे श्री मोहन सिंह रावत को उत्तराखण्ड आन्दोलन में सक्रिय योगदान और संघर्षमय जीवन के कारण उन्हें बाबा मोहन उत्तराखण्डी कहा जाता था। वे जल, जंगल, जमीन और उत्तराखण्ड से संबंधित कई जनपक्षीय मुद्दों को लेकर जीवन भर संघर्षमय रहे। बाबा बचपन से ही संघर्षशील और जुझारु प्रवृत्ति के थे। वे पर्वतीय जनता के हितों के लिये सदैव ही चिंतित रहते थे। इण्टर तक की शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे सेना में भर्ती हो गये थे। किंतु पर्वतीय जनता के जल, जंगल, जमीन के सवालों पर उद्वेलित होकर उन्होंने सेना की नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह से समाजसेवा के लिये समर्पित हो गये। १९८६ से १९९१ तक वे ग्राम सभा बंठाली के ग्राम प्रधान रहे और इस पद पर रहते हुये उन्होंने जनसेवा और ईमानदारी की उत्कृष्ट मिसाल कायम की। अलग उत्तराखण्ड राज्य की प्राप्ति और गैरसैंण राजधानी को लेकर उन्होंने अपने जीवन काल में १३ बार आमरण अनशन किया। अंतिम बार जनपद चमोली के वेणीताल स्थित "टोपरी उडयार" पर गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाये जाने, स्थानीय युवाओं को रोजगार देने के लिये नीति बनाने और राज्य के समग्र विकास की मांग को लेकर उन्होंने २ जून, २००४ से अपना आमरण अनशन शुरु किया और अंततः ३९ दिन के अनशन के बाद ९ जुलाई, २००४ को राज्य हित में अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। उनका उत्तराखण्ड प्रेम वास्तव में अनुकरणीय है, यह ब्लाग उनके बलिदान पर श्रद्धासुमन अर्पित करता है। साथ ही उत्तराखण्ड सरकार से मांग करता है कि उनके शहादत दिवस (९ जुलाई) को राज्य आंदोलनकारी बलिदान दिवस के रुप में घोषित किया जाय।